मानव जीवन जितना बाहरी रूप से सक्रिय और व्यस्त दिखाई देता है, उतना ही भीतर से जटिल और अशांत भी होता है। मैं स्वयं कई वर्षों से मानसिक परेशानी से गुजर रहा था—कुछ व्यक्तिगत कारणों से, तो कुछ पेशेवर दबावों के कारण। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता था, लेकिन भीतर मन लगातार विचारों, चिंताओं और असंतोष से घिरा रहता था। ऐसे ही दौर में मेरे मन में विपश्यना का विचार पहली बार गंभीरता से आया।
मैं कई बार बोधगया गया था। महाबोधि मंदिर के आसपास शांति से ध्यान करते साधकों को देखकर मन में जिज्ञासा तो होती थी, लेकिन जानकारी बहुत सीमित थी। बस इतना पता था कि “यह कुछ अच्छा है, मन के लिए लाभदायक है।” पिछले लगभग दस वर्षों से मैं सोचता रहा कि कभी न कभी 10 दिनों का विपश्यना कोर्स करूंगा, लेकिन समय, जिम्मेदारियाँ और बहाने हमेशा आड़े आते रहे।
आख़िरकार मैंने 2025 में दृढ़ निश्चय किया—अब नहीं तो कभी नहीं।
नवंबर माह में मैंने बोधगया स्थित विपश्यना केंद्र में पंजीकरण कराया और 15 नवंबर से 25 नवंबर 2025 तक 10 दिनों का संकल्प लिया। यह केवल एक कोर्स नहीं था, बल्कि मेरे जीवन की दिशा बदल देने वाला अनुभव साबित हुआ।
विपश्यना क्या है? — केवल ध्यान नहीं, आत्मनिरीक्षण की कला
विपश्यना एक अत्यंत प्राचीन ध्यान विधि है, जिसका अर्थ है—वस्तुओं को जैसे वे वास्तव में हैं, वैसे देखना।
यह केवल आंखें बंद कर बैठने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने मन और शरीर में घट रही हर संवेदना को बिना प्रतिक्रिया के देखने का अभ्यास है।
महात्मा बुद्ध ने लगभग 2500 वर्ष पहले इस विधि को खोजा। यह कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, न ही किसी संप्रदाय से जुड़ी हुई है। विपश्यना विशुद्ध रूप से अनुभव पर आधारित विज्ञान है—मन का विज्ञान।
10 दिनों का अनुशासित जीवन: विपश्यना का दैनिक शेड्यूल
विपश्यना कोर्स का सबसे विशेष पहलू उसका कठोर लेकिन सुस्पष्ट अनुशासन है।
इन 10 दिनों में:
किसी से बात नहीं करनी होती (पूर्ण मौन)
मोबाइल, किताब, डायरी, संगीत—सब वर्जित
बाहरी दुनिया से पूर्णतः कटाव
दैनिक शेड्यूल कुछ इस प्रकार होता है:
🕓 सुबह 4:00 बजे – जागरण
🕟 4:30 से 6:30 – ध्यान साधना
🕖 6:30 – नाश्ता
🕗 8:00 से 11:00 – ध्यान (समूह व व्यक्तिगत)
🕛 11:00 – दोपहर का भोजन
🕐 1:00 से 5:00 – ध्यान सत्र
🕕 6:00 से 7:00 – समूह साधना
🕢 7:00 – प्रवचन (वीडियो)
🕘 9:00 – विश्राम
यह शेड्यूल सुनने में कठिन लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह अनुशासन ही साधना का आधार बन जाता है।
पहले तीन दिन: संघर्ष, बेचैनी और मन का विद्रोह
शुरुआती तीन दिन मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण थे।
श्वास पर ध्यान केंद्रित करना—सांस का आना-जाना देखना—सुनने में सरल लगता है, लेकिन व्यवहार में मन बार-बार भटकता है। कभी पुरानी यादें, कभी भविष्य की चिंताएँ, कभी अनावश्यक कल्पनाएँ।
इन दिनों मन जैसे विद्रोह करता है:
> “यह क्या कर रहा हूँ मैं?
10 दिन बिना बोले? बिना मोबाइल?”
लेकिन यही वह चरण है जहाँ मन की वास्तविक स्थिति सामने आती है।
चौथा दिन: जब विपश्यना का वास्तविक अर्थ समझ में आता है
चौथे दिन से असली विपश्यना शुरू होती है।
अब ध्यान केवल श्वास तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शरीर में हो रही सूक्ष्म संवेदनाओं पर जाता है—गर्मी, ठंड, झनझनाहट, दर्द, कंपन।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सिखाया जाता है:
> “कोई भी संवेदना स्थायी नहीं है।”
यही बोध धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू पर लागू होने लगता है।
मन की परतें खुलना: विकारों से मुक्ति की प्रक्रिया
इन 10 दिनों में मैंने महसूस किया कि मन में वर्षों से जमा:
क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार,ईर्ष्या,लालच,कामचोरी, चुगलखोरी, घूसखोरी जैसी प्रवृत्तियाँ
ये सब अचानक खत्म नहीं होतीं, लेकिन उनकी जड़ कमजोर पड़ने लगती है।
विपश्यना हमें सिखाती है कि:
प्रतिक्रिया मत करो
केवल देखो, समझो और स्वीकार करो
जब हम प्रतिक्रिया देना छोड़ देते हैं, तो विकार स्वयं शांत होने लगते हैं।
10 दिनों के बाद: भीतर की शांति का अनुभव
कोर्स समाप्त होने के बाद मैंने स्वयं में एक स्पष्ट परिवर्तन महसूस किया।
मन अधिक शांत था
विचारों की भीड़ कम हो गई थी
निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हुई
छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आना कम हो गया
सबसे बड़ी बात—मैं स्वयं को बेहतर समझने लगा।
जो विचार मुझे वर्षों से परेशान कर रहे थे, उनका प्रभाव काफी कम हो चुका था।
भारत में विपश्यना की पुनर्स्थापना
महात्मा बुद्ध के बाद भारत में यह विधि धीरे-धीरे लुप्त हो गई।
लगभग 40–50 वर्ष पहले सत्यनारायण गोयनका जी ने इसे म्यांमार से पुनः भारत में स्थापित किया।
आज भारत ही नहीं, बल्कि:
अमेरिका,यूरोप,एशिया,ऑस्ट्रेलिया
दुनिया भर में हजारों विपश्यना केंद्र कार्यरत हैं।
यह सभी केंद्र दान पर आधारित हैं—कोई शुल्क नहीं लिया जाता।
विपश्यना के लाभ: क्यों हर व्यक्ति को इसे जानना चाहिए
विपश्यना का अभ्यास:
मानसिक शांति देता है
तनाव और अवसाद को कम करता है
आत्मअनुशासन बढ़ाता है
नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है
निर्णय क्षमता और एकाग्रता बढ़ाता है
चाहे आप:
छात्र हों
शिक्षक हों
अधिकारी हों
राजनेता हों
गृहिणी हों
या किसी भी पेशे में हों
यदि आप मानसिक सुख-शांति और संतुलित जीवन चाहते हैं, तो विपश्यना अत्यंत उपयोगी है।
निष्कर्ष: एक विनम्र आग्रह
मेरे लिए विपश्यना केवल 10 दिनों का कोर्स नहीं था, बल्कि जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण था।
मैं अपने सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ—यदि जीवन में कभी अवसर मिले, तो 10 दिनों का विपश्यना कोर्स अवश्य करें।
यह निःशुल्क है, लेकिन इसका मूल्य अनमोल है।
✦ आत्ममंथन के लिए प्रश्न ✦
क्या हम अपने मन को उतना समय और ध्यान देते हैं, जितना हम अपने शरीर और बाहरी दुनिया को देते हैं?
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