
आज 27 सितंबर 2026 है—विश्व पर्यटन दिवस। जब संपूर्ण विश्व दूर-दराज़ के महाद्वीपों, जगमगाते महानगरों और व्यावसायिक सैरगाहों की चर्चा में व्यस्त है, तब मन में अपनी माटी, अपनी धरोहर और अपनी संस्कृति का संधान करने का संकल्प जागा। लोक में एक उक्ति प्रसिद्ध है—"यदि घूमना है तो अपना बिहार घूमो, अपना कैमूर घूमो।" कारण स्पष्ट है; कैमूर की अभेद्य पर्वतमालाओं की गोद में एक ऐसा देवायतन स्थित है, जो विगत दो हज़ार वर्षों से बिना किसी रुकावट के अनवरत चैतन्य और जीवित है, जहाँ पूजा की दीप-शिखा शताब्दियों की आँधियों के बीच भी कभी बुझी नहीं। वह पावन धाम है—माँ मुण्डेश्वरी।
आज का यह यात्रा-वृत्तांत केवल एक भौगोलिक परिभ्रमण नहीं, बल्कि इतिहास, अध्यात्म, प्रकृति और कौतुहल का एक अनूठा संगम है। इस परिभ्रमण का संचालन दो संवाहकों द्वारा हुआ—मेरे पिताजी सत्येन्द्र कुमार पाठक, जो वरिष्ठ साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्यकार हैं और जिन्हें हाल ही में 18-19 सितंबर 2026 को 'मातेश्वरी विद्या देवी बाल साहित्य शोध संस्थान, सिरसा (हरियाणा)' द्वारा 'सृजन श्रेष्ठ' सम्मान से अलंकृत किया गया है, तथा मैं स्वयं (प्रवीण कुमार पाठक), जिला जीविका प्रशिक्षण अधिकारी (औरंगाबाद), एक जिज्ञासु यात्री, लेखक एवं ब्लॉगर।
द्विपहिया मोटरसाइकिल पर सवार होकर, हवा को चीरते हुए, कैमूर की हरी-भरी घाटियों के बीच से गुज़रना अपने आप में रोमांच की पराकाष्ठा थी। बिहार का सबसे पश्चिमी ज़िला 'कैमूर', जो 1991 से पूर्व रोहतास का हिस्सा हुआ करता था, विंध्य पर्वत श्रृंखला के पूर्वी छोर पर बसा हुआ है। 100 किलोमीटर लंबी और 50 किलोमीटर चौड़ी यह पर्वतमाला अपने भीतर अनंत पौराणिक और ऐतिहासिक रहस्य छिपाए हुए है।
प्रथम चरण: माँ मुण्डेश्वरी धाम – 510 सीढ़ियाँ, अष्टकोणीय स्थापत्य और अद्वैत की भूमि
भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ गाँव से लगभग तीन किलोमीटर दूर, कैमूर पर्वत समूह की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित है मुण्डेश्वरी श्रृंखला। 608 फीट की ऊँचाई पर स्थित माँ मुण्डेश्वरी का यह धाम दूर से ही श्रद्धालु के मन में भक्ति और विस्मय का संचार कर देता है। धाम तक पहुँचने के दो मार्ग हैं—एक चार पहिया और दो पहिया वाहनों के लिए बनाई गई सर्पिलाकार सड़क और दूसरा 510 पक्की सीढ़ियों का मार्ग।
हमने मोटरसाइकिल को नीचे खड़ा कर सीढ़ियों का मार्ग चुना। हर पचास सीढ़ियों पर बने विश्राम चबूतरे पर रुकते हुए, प्रकृति के मनोरम दृश्यों को निहारते हुए ऊपर चढ़ना एक आध्यात्मिक साधना जैसा प्रतीत हो रहा था। चढ़ते समय साँस भले ही फूल रही थी, लेकिन जैसे-जैसे मंदिर शिखर निकट आ रहा था, एक अज्ञात ऊर्जा शरीर में प्रविष्ट हो रही थी।
इतिहास के पन्नों में मुण्डेश्वरी:
मंदिर का इतिहास चार युगों की कथाओं और पुरातात्विक साक्ष्यों का अद्भुत सम्मिश्रण है। पौराणिक संदर्भानुसार, श्रीमद्देवीभागवत और दुर्गा सप्तशती में वर्णित असुर शुंभ-निशुंभ के प्रचंड सेनापति चंड और मुण्ड का वध इसी क्षेत्र में हुआ था। माँ दुर्गा ने जब चंड का संहार किया तो वे 'चामुंडा' कहलाईं और जब मुण्ड का वध इस पर्वत पर किया तो यह क्षेत्र 'माँ मुण्डेश्वरी' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
पुरातात्विक दृष्टि से, सन् 1904 में प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद डॉ. ब्लॉच ने यहाँ से एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण शिलालेख खोज निकाला था, जो महाराज उदयसेन के शासनकाल (शक संवत 30 अर्थात् 108 ईस्वी) का है। यह अभिलेख इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि यह मंदिर कम से कम दो हज़ार वर्ष प्राचीन है। सन् 635 ईस्वी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग इस क्षेत्र से गुज़रा, तो उसने अपने यात्रा-वृत्तांत में स्पष्ट लिखा—"कैमूर पर्वत की चोटी पर एक ऊँचा और प्रभावकारी मंदिर स्थित है, जहाँ दिन-रात अखंड उपासना होती है।" बाद में 1850 के दशक में अंग्रेजों ने इसे खंडहर मान लिया था, किंतु 1970 में बिहार सरकार ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया और 2015 में इसे राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में मान्यता दी।
गर्भगृह का अलौकिक दृश्य और 5 अद्भुत चमत्कार:
मुण्डेश्वरी मंदिर का स्थापत्य नागर शैली का एक अनोखा उदाहरण है। यह अष्टकोणीय (Octagonal) आकार में बना है, जहाँ पत्थरों को बिना किसी सीमेंट या चूने के, केवल वैज्ञानिक नक्काशी और 'इंटरलॉकिंग' तकनीक से जोड़ा गया है। दीवारों पर द्वारपाल, गंगा-यमुना, भगवान गणेश, विष्णु, सूर्य और नवग्रहों की अति-सुंदर पाषाण मूर्तियां उकेरी गई हैं।
मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य इसका गर्भगृह है। सामान्यतः भारत में या तो केवल शिव मंदिर होते हैं या केवल शक्तिपीठ। परंतु मुण्डेश्वरी धाम में शक्ति और शिव एक ही स्थान पर आबद्ध हैं। गर्भगृह के केंद्र में महिषासुरमर्दिनी रूप में माँ मुण्डेश्वरी की चतुर्भुजी काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है, जिस पर प्राचीन आक्रांताओं द्वारा पहुँचाए गए आघात के निशान आज भी दृश्यमान हैं। माँ के ठीक बगल में स्थापित है अति-दुर्लभ 'पंचमुखी शिवलिंग'। चार मुख चारों दिशाओं (चारों वेदों) के प्रतीक हैं और पांचवाँ ऊर्ध्व मुख मोक्ष का प्रतीक है। यह दर्शन अद्वैत सिद्धांत को प्रतिपादित करता है—जो शिव की भक्ति करेगा, उसे शक्ति प्राप्त होगी और जो शक्ति की आराधना करेगा, उसे शिव रूपी मोक्ष मिलेगा।
यहाँ के पाँच चमत्कार आज भी आधुनिक विज्ञान को चुनौती देते हैं:
रंग बदलता शिवलिंग: गर्भगृह में स्थापित पंचमुखी शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है। प्रातः काल इसका वर्ण सुनहरा होता है, दोपहर में हल्का सांवला/काला और संध्या की आरती के समय यह पुनः सुनहरी आभा से दीप्तिमान हो उठता है।
अहिंसक बलि की अनूठी परंपरा: यह संपूर्ण विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ बलि तो दी जाती है, परंतु जीव हत्या नहीं होती। भक्त जब मन्नत पूरी होने पर बकरा लाते हैं, तो पुजारी उसे माता के श्रीचरणों में खड़ा कर मंत्रोच्चार के साथ अक्षत (चावल) छिड़कते हैं। अक्षत स्पर्श होते ही बकरा बेहोश होकर गिर पड़ता है। कुछ क्षणों बाद पुनः अक्षत छिड़कने पर वह उठ खड़ा होता है और उसे ससम्मान मुक्त कर दिया जाता है।
मन्नतों की चुनरियों का जाल: मंदिर परिसर की लोहे की जालियों पर 10,000 से अधिक मन्नत की लाल चुनरियाँ बंधी हैं। हर चुनरी के पीछे किसी श्रद्धालु की आस्था, अश्रु और पूर्ण हुई मन्नत की गाथा छिपी है।
रात्रि काल में गूँजती घंटियाँ: स्थानीय पुजारियों और ग्रामीणों का दावा है कि अर्धरात्रि में जब मंदिर का कपाट बंद हो जाता है, तब अंदर से घंटियों, शंख और नूपुरों की मधुर ध्वनि सुनाई देती है। मान्यता है कि रात्रि में देवगण स्वयं माँ की आराधना करने उतरते हैं।
अष्टकोणीय पाषाण नक्काशी: पत्थरों पर उकेरी गई गंगा-यमुना और कीर्तिमुख की आकृतियाँ आज भी उतनी ही जीवंत लगती हैं जितनी दो हज़ार वर्ष पूर्व रही होंगी।
परिसर में 7वीं शताब्दी के नंदी महाराज विराजमान हैं, जिन पर लाल चुनरी और गेंदे के फूलों की माला सुशोभित है। ट्रस्ट द्वारा बनाया गया पृथक 'नारियल स्थल', जल अर्पण हेतु सोन व कर्मनाशा का पवित्र जल, तथा चैत्र व शारदीय नवरात्र में जलने वाला अखंड 'हवन कुंड' इस धाम की पवित्रता को कई गुना बढ़ा देते हैं।
द्वितीय चरण: अधौरा का पठार, मुसहरवा बाबा और तेल्हार कुण्ड का रहस्य
मुण्डेश्वरी धाम में दर्शन-पूजन के उपरांत, हमारी मोटरसाइकिलें अधौरा प्रखंड की ओर मुड़ गईं। मुण्डेश्वरी से 40 किलोमीटर दूर स्थित अधौरा बिहार का सबसे ऊँचा और दुर्गम प्रखंड है, जो समुद्र तल से लगभग 1500 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। घने जंगलों, घुमावदार पहाड़ी रास्तों और ठंडी हवाओं के कारण ही ब्रिटिश काल में इसे "बिहार का शिमला" कहा जाता था।
मुसहरवा बाबा का अनोखा मंदिर:
अधौरा के मार्ग में घने जंगलों के बीच एक अनोखा लोक-तीर्थ आता है—मुसहरवा बाबा का मंदिर। यहाँ की परंपरा सुनकर कोई भी स्तब्ध रह सकता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु बाबा को प्रसाद के रूप में मिठाई या फल नहीं, बल्कि 'बीड़ी' अर्पित करते हैं। बीड़ी सुलगाकर बाबा को चढ़ाई जाती है और वही बीड़ी प्रसाद स्वरूप भक्तों में बाँटी जाती है। माना जाता है कि दुर्गम जंगलों और हिंसक पशुओं से रक्षा के लिए राहगीर मुसहरवा बाबा की कृपा याचना करते हैं। हमने भी बाबा का दर्शन किया और लोक-संस्कृति के इस अनूठे रंग को नज़दीक से देखा।
तेल्हार कुण्ड एवं तेल्हार झरना:
मुसहरवा बाबा के दर्शन के बाद हम पहुँचे तेल्हार कुण्ड। पहाड़ के विशाल पत्थरों के बीच से लगभग 100 फीट की ऊँचाई से गिरता हुआ पानी नीचे एक विशाल और प्राकृतिक कुण्ड का निर्माण करता है। इस कुण्ड की गहराई 100 फीट से भी अधिक मानी जाती है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि भयंकर ग्रीष्मकाल में भी जब कैमूर की अन्य जलधाराएँ सूख जाती हैं, तेल्हार कुण्ड का जल कभी नहीं सूखता।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहाँ कुछ समय व्यतीत किया था। महाबली भीम ने अपनी गदा के प्रहार से इस कुण्ड का निर्माण किया था, इसलिए स्थानीय लोक-भाषा में इसे 'भीम कुण्ड' भी कहा जाता है। पास ही स्थित एक विशाल प्राकृतिक गुफा को 'भीम की गुफा' के नाम से जाना जाता है। इस कुण्ड का जल इतना स्वच्छ, शीतल और खनिज-समृद्ध है कि महीनों बोतल में बंद रखने पर भी खराब नहीं होता। कुण्ड से आगे बढ़कर यही जलधारा 100 फीट नीचे गिरकर एक विकराल और अप्रतिम 'तेल्हार झरने' का रूप धारण कर लेती है, जिसकी कलकल ध्वनि संपूर्ण घाटी में गूँजती रहती है।
कैमूर की आत्मा: 55 किलोमीटर लंबी सुअरा (सुवरा) नदी का इतिहास व भूगोल
कैमूर के पर्यटन की चर्चा अक्सर मुण्डेश्वरी धाम और तेल्हार कुण्ड तक सीमित रह जाती है, परंतु इस संपूर्ण पारिस्थितिकी और अध्यात्म को सींचने वाली मूल चेतना है—सुअरा नदी (जिसे स्थानीय लोग सुवरा या प्राचीन अभिलेखों में सुवरन नदी कहते हैं)।
हमारे इस परिभ्रमण का एक मुख्य उद्देश्य इस मौसमी नदी के यथार्थ को समझना भी था। तेल्हार कुण्ड के मुहाने से लेकर भभुआ शहर तक, हम इसी सुअरा नदी के समांतर अपनी मोटरसाइकिल से चले।
सुअरा नदी का जीवन-चक्र:
उद्गम: सुअरा नदी का जन्म तेल्हार कुण्ड और आसपास की कैमूर पहाड़ियों के रिसाव जल से होता है। तेल्हार प्रपात से गिरती धाराएँ ही आगे एकत्र होकर सुअरा नदी का रूप लेती हैं।
प्रवाह मार्ग: 55 किलोमीटर लंबी यह नदी मुख्यतः तीन प्रखंडों से होकर गुज़रती है:
अधौरा प्रखंड (0 से 20 किमी): यहाँ यह पूरी तरह से एक पहाड़ी और जंगली नदी है। घने जंगलों के बीच चट्टानों से टकराती हुई बहती है। यहाँ खरवार और चेरो जनजातियों के गाँव इसी नदी के जल पर आश्रित हैं।
भगवानपुर प्रखंड (20 से 40 किमी): पहाड़ से उतरकर नदी मैदानी भाग में आती है। मुण्डेश्वरी पर्वत श्रृंखला के ठीक पाद-प्रदेश (तलहटी) से बहते हुए यह रामगढ़ और भगवानपुर के कृषि क्षेत्रों को जल प्रदान करती है।
भभुआ प्रखंड (40 से 55 किमी): भभुआ ज़िला मुख्यालय के समीप से गुज़रते हुए यह नदी अंततः दुर्गावती नदी में विलीन हो जाती है। दुर्गावती आगे चलकर कर्मनाशा में और कर्मनाशा नदी गंगा में जाकर मिलती है।
सांस्कृतिक और आर्थिक महत्त्व:
सुअरा नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि कैमूर के किसानों की जीवन-रेखा है। सूखाग्रस्त माने जाने वाले इस ज़िले में भभुआ के 25 गाँव, भगवानपुर के 20 गाँव और अधौरा के 15 गाँव—कुल मिलाकर लगभग 10,000 एकड़ कृषि योग्य भूमि की सिंचाई इसी नदी के जल से होती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी सुअरा का संबंध मुण्डेश्वरी धाम से अत्यंत गहरा है। प्राचीन काल में माँ मुण्डेश्वरी का नित्य जलाभिषेक इसी नदी के जल से होता था। आज भी नवरात्र के पावन अवसरों पर श्रद्धालु इसी पवित्र नदी में स्नान व आचमन कर माँ के दर्शन हेतु सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। नदी के बीच पड़ी विशाल चट्टानों पर बैठकर पहाड़ी नदी की कल-कल ध्वनि सुनना, गुफाओं के मुहाने को देखना और इसके संरक्षण का संकल्प लेना इस यात्रा का सबसे ज्ञानवर्धक अनुभव रहा।
उपसंहार: विरासत का गौरव और स्मृति-शेष
27 सितंबर 2026 का यह परिभ्रमण हमारे जीवन की सबसे अमूल्य स्मृतियों में दर्ज हो गया है। एक तरफ जहाँ 2000 साल पुराने मुण्डेश्वरी मंदिर के पाषाण हमें भारत के प्राचीन गौरव, स्थापत्य और अटूट आस्था की कहानी सुना रहे थे, वहीं दूसरी तरफ तेल्हार कुण्ड की उत्ताल जलधाराएँ और सुअरा नदी की कलकल बहती धारा हमें प्रकृति के संरक्षण का संदेश दे रही थीं।
पिताजी सत्येन्द्र कुमार पाठक के ऐतिहासिक दृष्टिकोण और मेरे खोजी यात्रा-भाव ने इस परिभ्रमण को केवल एक सैरगाह नहीं, बल्कि एक जीवंत शोध-यात्रा बना दिया। बिहार की धरती केवल इतिहास की किताबों में दर्ज पन्ने नहीं है; यह कैमूर की पहाड़ियों में आज भी जीवंत स्पंदित हो रही है।
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर मन स्वतः ही इन पंक्तियों में मचल उठा:
"मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते साँस फूली,
पर माता के दरबार में पहुँचते ही, सारी थकान भूली।
तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी,
सुअरा की धारा कहती है, बहती हूँ मैं बड़ी-बड़ी।"
जय माँ मुण्डेश्वरी! जय तेल्हार कुण्ड! जय मुसहरवा बाबा! जय सुअरा नदी! जय कैमूर, जय बिहार!





