19 अक्टूबर 2026 की व्यस्त और यादगार यात्रा के बाद हम अपने होटल में रात्रि विश्राम के लिए लौट आए थे। अगले दिन, 20 अक्टूबर को हमारी ट्रेन टुंडला जंक्शन से गया के लिए रवाना होने वाली थी। ट्रेन का निर्धारित समय दोपहर तीन बजे था। इसलिए हमने सुबह आठ बजे होटल से निकलने की योजना बनाई, ताकि रास्ते में कुछ और धार्मिक स्थलों के दर्शन कर सकें।
सुबह उठकर हम सभी ने स्नान-ध्यान किया और होटल से चेक-आउट कर लिया। मैं, प्रवीण कुमार पाठक, अपनी पत्नी अनीता और अपने दोनों प्यारे बच्चों डुग्गू-पुछू के साथ वृंदावन की इस यात्रा को कुछ और यादगार बनाना चाहता था।
हमारा पहला पड़ाव वृंदावन का प्राचीन माना जाने वाला माँ चामुंडा देवी मंदिर था। होटल से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर में हमने माता रानी के दर्शन किए और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
वृंदावन केवल राधा-कृष्ण की भक्ति के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहाँ अनेक देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं। इन मंदिरों से ब्रज क्षेत्र की विविध धार्मिक परंपराओं का परिचय मिलता है। माँ चामुंडा देवी के दर्शन के बाद मन में संतोष और प्रसन्नता का अनुभव हुआ। इसके साथ ही वृंदावन में हमारे प्रवास का अंतिम चरण भी पूरा होने लगा।
दर्शन के बाद हम वृंदावन से आगरा जाने के लिए निकले। हमने वृंदावन कट के निकट यमुना एक्सप्रेसवे पर उपलब्ध बस सेवा का सहारा लिया। यह स्थान वृंदावन से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। यमुना एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख आधुनिक मार्ग है, जो दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र को आगरा से जोड़ता है। इस मार्ग के कारण सड़क यात्रा पहले की तुलना में काफी सुविधाजनक हुई है। बस से आगरा की ओर जाते समय हमने रास्ते के सुंदर दृश्यों का आनंद लिया। बच्चों के लिए भी यह सफर मनोरंजक था।
लगभग 11 बजे हम आगरा पहुँच गए। आगरा ऐतिहासिक दृष्टि से भारत के प्रमुख नगरों में से एक है। ताजमहल, आगरा किला और मुगलकालीन स्थापत्य कला के कारण यह विश्वभर में प्रसिद्ध है। हमारी पिछली यात्रा में हम ताजमहल और आगरा किले जैसे प्रमुख स्थलों को देख चुके थे। इस बार हमारा उद्देश्य समय पर टुंडला पहुँचना और ट्रेन पकड़ने से पहले कुछ स्थानीय धार्मिक स्थलों का भ्रमण करना था।
आगरा से हम ऑटो द्वारा टुंडला जंक्शन की ओर रवाना हुए। लगभग दोपहर 12 बजे हम टुंडला पहुँच गए। हमारे पास ट्रेन आने तक लगभग तीन घंटे का समय था। हमने सोचा कि जब यात्रा पर निकले ही हैं, तो इस समय का सदुपयोग क्यों न किया जाए? टुंडला और उसके आसपास भी धार्मिक स्थल हैं, जिनके दर्शन करके स्थानीय संस्कृति और इतिहास को समझा जा सकता है।
इसी विचार के साथ हमने टुंडला के नजदीक स्थित एक भव्य वैष्णो देवी मंदिर जाने का निर्णय लिया। संयोग से उस दिन विजयादशमी यानी दशहरा का पर्व भी था। इसलिए माता रानी के दर्शन करना हमारे लिए और भी विशेष अनुभव बन गया।
टुंडला से लगभग 12–15 किलोमीटर की दूरी तय करके हम वैष्णो देवी मंदिर पहुँचे। मंदिर का परिसर सुंदर और आकर्षक था। मंदिर की बनावट तथा वहाँ बनाई गई गुफाओं ने हमारा ध्यान खींचा। माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद हम मंदिर की छत पर बने गुफानुमा मार्गों में गए। इन गुफाओं के भीतर विभिन्न धार्मिक स्थलों और मंदिरों को देखने का अवसर मिला।
हमारे बच्चों डुग्गू-पुछू के लिए यह अनुभव विशेष रूप से रोमांचक था। शुरुआत में छोटे बच्चे को गुफा के भीतर जाने में डर लग रहा था। अँधेरे और गुफा के अलग वातावरण के कारण वह थोड़ा घबरा गया। हमने उसे प्यार से समझाया और उसका हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे उसका डर कम हुआ और वह भी गुफा के अंदर जाने तथा वहाँ की संरचनाओं को देखने का आनंद लेने लगा।
माता रानी के दर्शन और बच्चों के इस अनुभव ने हमारी यात्रा में एक नया रंग भर दिया। परिवार के साथ घूमने का वास्तविक आनंद भी यही है कि हर स्थान केवल देखने की चीज नहीं रहता, बल्कि उससे जुड़ी यादें जीवनभर हमारे साथ रहती हैं।
वैष्णो देवी मंदिर से लौटकर हम टुंडला आए। ट्रेन के प्रस्थान में अभी कुछ समय शेष था। इसलिए हमने टुंडला रेलवे स्टेशन के नजदीक स्थित एक जैन मंदिर के दर्शन करने का निर्णय लिया।
मंदिर में भगवान ऋषभदेव, जिन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है, की प्रतिमा के दर्शन किए। भगवान ऋषभदेव जैन धर्म की परंपरा के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकरों की मान्यता है, जिन्होंने आत्मसंयम, अहिंसा, तप और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग दिखाया।
जैन धर्म की सबसे प्रमुख शिक्षाओं में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और आत्मानुशासन शामिल हैं। इन सिद्धांतों का उद्देश्य मनुष्य को संयमित जीवन जीने और सभी जीवों के प्रति करुणा रखने की प्रेरणा देना है। मंदिर का शांत वातावरण हमें बहुत अच्छा लगा। यहाँ दर्शन करते हुए बच्चों को भी जैन धर्म और उसके प्रथम तीर्थंकर के बारे में बताने का अवसर मिला। मेरे लिए यात्रा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है; यह परिवार के साथ सीखने, समझने और ज्ञान बढ़ाने का भी माध्यम है। इस प्रकार टुंडला में कुछ ही घंटों के भीतर हमें एक देवी मंदिर और एक जैन मंदिर के दर्शन करने का अवसर मिला। यह हमारी यात्रा का छोटा, लेकिन ज्ञानवर्धक पड़ाव था।
मंदिर के दर्शन के बाद हम टुंडला लौट आए। वहाँ हमने भोजन किया और रात के सफर के लिए रोटी, सब्जी और अचार पैक करवाया। बच्चों के साथ लंबी रेल यात्रा में भोजन और आवश्यक सामान पहले से तैयार रखना सुविधाजनक होता है।
इसके बाद हम टुंडला रेलवे स्टेशन पहुँचे। हमारी ट्रेन लगभग चार बजे आई। हमने अपने निर्धारित कोच B2, एसी थ्री-टियर में प्रवेश किया। हमारी सीटें 37 और 38 थीं। सामान व्यवस्थित करने के बाद हम सभी आराम से बैठ गए।
ट्रेन के चलने के साथ ही आगरा, मथुरा, वृंदावन, गोकुल और टुंडला की यादें मन में ताजा होने लगीं। पिछले कुछ दिनों में हमने अनेक मंदिरों के दर्शन किए, ऐतिहासिक स्थलों को देखा, स्थानीय बाजारों में खरीदारी की और ब्रज की धार्मिक संस्कृति को करीब से समझा।
रात के सफर में बच्चों ने आराम किया और हम भी यात्रा की थकान दूर करने लगे। ट्रेन में बैठकर पीछे छूटे स्थानों के बारे में सोचते हुए लगा कि यात्रा का महत्व केवल गंतव्य तक पहुँचने में नहीं, बल्कि रास्ते में प्राप्त अनुभवों और सीख में भी है।
औरंगाबाद वापसी और यात्रा का समापन
21 अक्टूबर 2026 की सुबह लगभग छह बजे हम अपने गंतव्य औरंगाबाद पहुँच गए और अपने आवास पर लौट आए। इस तरह हमारा पारिवारिक भ्रमण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
इस यात्रा में ताजमहल और आगरा किले के ऐतिहासिक वैभव से लेकर वृंदावन की कृष्ण भक्ति, मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि, गोकुल की बाल लीलाओं से जुड़ी परंपराएँ और टुंडला के धार्मिक स्थलों तक अनेक विविध अनुभव प्राप्त हुए।
माँ चामुंडा देवी और वैष्णो देवी के दर्शन ने हमारी आस्था को नया अनुभव दिया, जबकि जैन मंदिर की यात्रा ने अहिंसा और संयम जैसे मूल्यों को समझने का अवसर प्रदान किया। बच्चों के लिए यह यात्रा मनोरंजन के साथ-साथ इतिहास, धर्म और संस्कृति की एक छोटी पाठशाला भी साबित हुई।
निष्कर्ष: यात्रा जो यादों के साथ ज्ञान भी दे गई
परिवार के साथ की गई यह यात्रा मेरे लिए केवल पर्यटन नहीं थी। इसने यह अनुभव कराया कि भारत की सांस्कृतिक विविधता कितनी व्यापक और समृद्ध है। कुछ ही दिनों में हमें मुगलकालीन स्थापत्य, कृष्ण भक्ति की परंपरा, देवी उपासना और जैन धर्म के सिद्धांतों से परिचित होने का अवसर मिला।
मेरे विचार से हर यात्रा में तीन बातें महत्वपूर्ण होती हैं—नई जगहों को देखना, उनके इतिहास और संस्कृति को समझना तथा परिवार के साथ सुंदर यादें बनाना। हमारी आगरा-मथुरा-वृंदावन-गोकुल-टुंडला यात्रा इन तीनों कसौटियों पर यादगार रही।
अब जब हम अपने घर लौट आए हैं, तो इस यात्रा की तस्वीरें, बच्चों की मुस्कान, मंदिरों की घंटियाँ, ‘राधे-राधे’ की गूँज और ऐतिहासिक स्थलों की स्मृतियाँ हमारे साथ हैं।
यात्रा समाप्त हुई, लेकिन अनुभवों और यादों का सफर जारी है।
प्रवीण कुमार पाठक
राधे-राधे! जय माता दी! जय श्रीकृष्ण!







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