सोमवार, 22 दिसंबर 2025

विपश्यना: मन के अंधकार से आत्मबोध की रोशनी तक — एक साधक की 10 दिनों की यात्रा...



    मानव जीवन जितना बाहरी रूप से सक्रिय और व्यस्त दिखाई देता है, उतना ही भीतर से जटिल और अशांत भी होता है। मैं स्वयं कई वर्षों से मानसिक परेशानी से गुजर रहा था—कुछ व्यक्तिगत कारणों से, तो कुछ पेशेवर दबावों के कारण। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता था, लेकिन भीतर मन लगातार विचारों, चिंताओं और असंतोष से घिरा रहता था। ऐसे ही दौर में मेरे मन में विपश्यना का विचार पहली बार गंभीरता से आया।

मैं कई बार बोधगया गया था। महाबोधि मंदिर के आसपास शांति से ध्यान करते साधकों को देखकर मन में जिज्ञासा तो होती थी, लेकिन जानकारी बहुत सीमित थी। बस इतना पता था कि “यह कुछ अच्छा है, मन के लिए लाभदायक है।” पिछले लगभग दस वर्षों से मैं सोचता रहा कि कभी न कभी 10 दिनों का विपश्यना कोर्स करूंगा, लेकिन समय, जिम्मेदारियाँ और बहाने हमेशा आड़े आते रहे।
आख़िरकार मैंने 2025 में दृढ़ निश्चय किया—अब नहीं तो कभी नहीं।

नवंबर माह में मैंने बोधगया स्थित विपश्यना केंद्र में पंजीकरण कराया और 15 नवंबर से 25 नवंबर 2025 तक 10 दिनों का संकल्प लिया। यह केवल एक कोर्स नहीं था, बल्कि मेरे जीवन की दिशा बदल देने वाला अनुभव साबित हुआ।

विपश्यना क्या है? — केवल ध्यान नहीं, आत्मनिरीक्षण की कला

विपश्यना एक अत्यंत प्राचीन ध्यान विधि है, जिसका अर्थ है—वस्तुओं को जैसे वे वास्तव में हैं, वैसे देखना।
यह केवल आंखें बंद कर बैठने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने मन और शरीर में घट रही हर संवेदना को बिना प्रतिक्रिया के देखने का अभ्यास है।

महात्मा बुद्ध ने लगभग 2500 वर्ष पहले इस विधि को खोजा। यह कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, न ही किसी संप्रदाय से जुड़ी हुई है। विपश्यना विशुद्ध रूप से अनुभव पर आधारित विज्ञान है—मन का विज्ञान।

10 दिनों का अनुशासित जीवन: विपश्यना का दैनिक शेड्यूल

विपश्यना कोर्स का सबसे विशेष पहलू उसका कठोर लेकिन सुस्पष्ट अनुशासन है।
इन 10 दिनों में:

किसी से बात नहीं करनी होती (पूर्ण मौन)

मोबाइल, किताब, डायरी, संगीत—सब वर्जित

बाहरी दुनिया से पूर्णतः कटाव


दैनिक शेड्यूल कुछ इस प्रकार होता है:

🕓 सुबह 4:00 बजे – जागरण

🕟 4:30 से 6:30 – ध्यान साधना

🕖 6:30 – नाश्ता

🕗 8:00 से 11:00 – ध्यान (समूह व व्यक्तिगत)

🕛 11:00 – दोपहर का भोजन

🕐 1:00 से 5:00 – ध्यान सत्र

🕕 6:00 से 7:00 – समूह साधना

🕢 7:00 – प्रवचन (वीडियो)

🕘 9:00 – विश्राम


यह शेड्यूल सुनने में कठिन लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह अनुशासन ही साधना का आधार बन जाता है।

पहले तीन दिन: संघर्ष, बेचैनी और मन का विद्रोह

शुरुआती तीन दिन मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण थे।
श्वास पर ध्यान केंद्रित करना—सांस का आना-जाना देखना—सुनने में सरल लगता है, लेकिन व्यवहार में मन बार-बार भटकता है। कभी पुरानी यादें, कभी भविष्य की चिंताएँ, कभी अनावश्यक कल्पनाएँ।

इन दिनों मन जैसे विद्रोह करता है:

> “यह क्या कर रहा हूँ मैं?
10 दिन बिना बोले? बिना मोबाइल?”



लेकिन यही वह चरण है जहाँ मन की वास्तविक स्थिति सामने आती है।

चौथा दिन: जब विपश्यना का वास्तविक अर्थ समझ में आता है

चौथे दिन से असली विपश्यना शुरू होती है।
अब ध्यान केवल श्वास तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शरीर में हो रही सूक्ष्म संवेदनाओं पर जाता है—गर्मी, ठंड, झनझनाहट, दर्द, कंपन।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सिखाया जाता है:

> “कोई भी संवेदना स्थायी नहीं है।”



यही बोध धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू पर लागू होने लगता है।

मन की परतें खुलना: विकारों से मुक्ति की प्रक्रिया

इन 10 दिनों में मैंने महसूस किया कि मन में वर्षों से जमा:

क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार,ईर्ष्या,लालच,कामचोरी, चुगलखोरी, घूसखोरी जैसी प्रवृत्तियाँ


ये सब अचानक खत्म नहीं होतीं, लेकिन उनकी जड़ कमजोर पड़ने लगती है।

विपश्यना हमें सिखाती है कि:

प्रतिक्रिया मत करो

केवल देखो, समझो और स्वीकार करो


जब हम प्रतिक्रिया देना छोड़ देते हैं, तो विकार स्वयं शांत होने लगते हैं।

10 दिनों के बाद: भीतर की शांति का अनुभव

कोर्स समाप्त होने के बाद मैंने स्वयं में एक स्पष्ट परिवर्तन महसूस किया।

मन अधिक शांत था

विचारों की भीड़ कम हो गई थी

निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हुई

छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आना कम हो गया


सबसे बड़ी बात—मैं स्वयं को बेहतर समझने लगा।

जो विचार मुझे वर्षों से परेशान कर रहे थे, उनका प्रभाव काफी कम हो चुका था।

भारत में विपश्यना की पुनर्स्थापना

महात्मा बुद्ध के बाद भारत में यह विधि धीरे-धीरे लुप्त हो गई।
लगभग 40–50 वर्ष पहले सत्यनारायण गोयनका जी ने इसे म्यांमार से पुनः भारत में स्थापित किया।

आज भारत ही नहीं, बल्कि:

अमेरिका,यूरोप,एशिया,ऑस्ट्रेलिया


दुनिया भर में हजारों विपश्यना केंद्र कार्यरत हैं।
यह सभी केंद्र दान पर आधारित हैं—कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

विपश्यना के लाभ: क्यों हर व्यक्ति को इसे जानना चाहिए

विपश्यना का अभ्यास:

मानसिक शांति देता है

तनाव और अवसाद को कम करता है

आत्मअनुशासन बढ़ाता है

नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है

निर्णय क्षमता और एकाग्रता बढ़ाता है


चाहे आप:

छात्र हों

शिक्षक हों

अधिकारी हों

राजनेता हों

गृहिणी हों

या किसी भी पेशे में हों


यदि आप मानसिक सुख-शांति और संतुलित जीवन चाहते हैं, तो विपश्यना अत्यंत उपयोगी है।

निष्कर्ष: एक विनम्र आग्रह

मेरे लिए विपश्यना केवल 10 दिनों का कोर्स नहीं था, बल्कि जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण था।
मैं अपने सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ—यदि जीवन में कभी अवसर मिले, तो 10 दिनों का विपश्यना कोर्स अवश्य करें।

यह निःशुल्क है, लेकिन इसका मूल्य अनमोल है।

✦ आत्ममंथन के लिए प्रश्न ✦

क्या हम अपने मन को उतना समय और ध्यान देते हैं, जितना हम अपने शरीर और बाहरी दुनिया को देते हैं?


बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

एक यात्री की डायरी और ब्लॉग क्यों है ज़रूरी ?...


यात्रा और पर्यटन केवल नए स्थानों को देखने या तस्वीरें लेने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरा और परिवर्तनकारी अनुभव है। यदि आप एक सच्चे यात्री हैं, जो घूमने-फिरने का शौक रखता है, तो आपको अपने अनुभवों को सहेजने के लिए एक यात्रा डायरी या ब्लॉग जरूर बनाना चाहिए। यह सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली माध्यम है जो आपके सफर को अर्थपूर्ण बनाता है और आपको कई प्रकार के लाभ दिलाता है।

एक यात्री के लिए अपनी डायरी या ब्लॉग लिखना इतना ज़रूरी क्यों है, इसे विस्तार से समझते हैं:



डायरी/ब्लॉग: स्मृतियों का अमूल्य भंडार....

यात्रा के दौरान हम कई अनोखे लोगों से मिलते हैं, अद्भुत दृश्य देखते हैं, और कई भावनाओं से गुज़रते हैं। समय के साथ ये बारीकियाँ धुंधली होने लगती हैं। एक यात्रा डायरी या ब्लॉग इन अनुभवों को जीवित रखता है। यह भविष्य में आपको उन पलों को फिर से जीने का अवसर देता है, चाहे वह किसी पहाड़ी गाँव की सुबह की चाय का स्वाद हो, या किसी प्राचीन मंदिर की शांति।
डायरी आपकी निजी यात्रा है, जहाँ आप बिना किसी संकोच के अपने विचारों, भावनाओं और अंतर्दृष्टि को लिख सकते हैं। वहीं, एक ब्लॉग इंटरनेट की दुनिया में आपके अनुभवों को लाखों लोगों तक पहुँचाने का मंच देता है।

लिखने के महत्वपूर्ण लाभ:..

एक यात्री को डायरी या ब्लॉग लिखने से व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों तरह के लाभ मिलते हैं:.

1. आत्म-चिंतन और व्यक्तिगत विकास (Self-Reflection and Personal Growth)
 * मनोवैज्ञानिक लाभ: डायरी लेखन एक तरह की मनःचिकित्सा है। यह आपको अपनी यात्रा के दौरान आए तनाव, खुशी, या किसी भी भाव को व्यक्त करने का सुरक्षित स्थान देता है। अपने अनुभवों को लिखने से आप आत्म-मूल्यांकन कर पाते हैं, अपनी गलतियों को पहचानते हैं और अपने जीवन के लक्ष्यों के प्रति अधिक स्पष्ट हो पाते हैं।
 * यादों का स्थायित्व: आप केवल स्थानों का ही नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों से हुई बातचीत, छोटे-छोटे मजेदार किस्सों और अपनी तत्कालीन भावनाओं को भी लिख पाते हैं, जो किसी फोटो या वीडियो में कैद नहीं हो सकता।

2. लेखन कौशल में सुधार और रचनात्मकता (Improvement in Writing Skills and Creativity)
 * लगातार लिखने से आपकी रचनात्मकता निखरती है और आपकी लेखन शैली सहज व सटीक बनती है। डायरी लेखन एक लेखक के रूप में आपके विकास की नींव डालता है।

3. दूसरों के लिए ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत (Source of Knowledge and Inspiration for Others)
 * सामुदायिक जुड़ाव: ब्लॉग के माध्यम से आप अपने अनुभवों, यात्रा सुझावों, लागत विवरणों और अनसुनी जगहों की जानकारी साझा करते हैं। यह जानकारी अन्य यात्रियों के लिए बहुत उपयोगी होती है, जिससे आप एक व्यापक ट्रैवल समुदाय से जुड़ पाते हैं।
 * प्रेरणा: आपकी कहानियाँ, खासकर चुनौतियों पर विजय पाने की कहानियाँ, उन लोगों को प्रेरित कर सकती हैं जो यात्रा करने का सपना देखते हैं लेकिन डरते हैं।

4. एक ब्रांड और करियर का निर्माण (Building a Brand and Career)
 * प्रतिष्ठा और पहचान: इंटरनेट के युग में, एक लोकप्रिय यात्रा ब्लॉग आपको एक 'ट्रैवल इन्फ्लुएंसर' या विशेषज्ञ के रूप में स्थापित कर सकता है। यह आपको समाज में एक विशिष्ट पहचान और प्रतिष्ठा दिलाता है।
 * आर्थिक लाभ: ब्लॉगिंग विज्ञापन, प्रायोजित पोस्ट या एफिलिएट मार्केटिंग के माध्यम से आय का एक स्रोत बन सकता है।

5. पुस्तक का रूप: अमरता की ओर कदम
आपके संकलित यात्रा अनुभवों को एक दिन एक आकर्षक पुस्तक का रूप दिया जा सकता है। एक प्रकाशित लेखक बनना न केवल समाज में आपकी प्रतिष्ठा को बढ़ाता है, बल्कि यह एक स्थायी आय का स्रोत भी बन सकता है। आपकी यात्रा की कहानियाँ, जब एक किताब में सिमटकर बाज़ार में आती हैं, तो वे एक विरासत बन जाती हैं।

 यात्रा डायरी या ब्लॉग एक यात्री की आत्मा होती है। यह उसे अपने अतीत से जोड़े रखती है, वर्तमान को समझने में मदद करती है, और भविष्य के लिए नए रास्ते खोलती है। यह साधारण से घूमने-फिरने के अनुभव को एक असाधारण यात्रा, एक प्रेरणादायक कहानी और एक सफल करियर में बदल सकती है।

सवाल: ..

आपके अनुसार, एक सफल यात्रा ब्लॉग या डायरी को सबसे ज़्यादा किस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए – स्थान के बारे में तथ्यात्मक जानकारी पर या यात्री की व्यक्तिगत भावनाओं और अनुभवों पर, और क्यों?

✈️ यात्रा: अनुभवों का अद्भुत संसार ✈️...



अक्सर यह सुनने को मिलता है कि “यात्रा में बहुत पैसा लगता है”, “समय की बर्बादी होती है” या “इतना घूमने से क्या फायदा?” — लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। यात्रा केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने का नाम नहीं है, यह जीवन का एक ऐसा अनुभव है जो हमें स्वयं को समझने, दुनिया को जानने और मानवता से जुड़ने का अवसर देता है।

मनुष्य जन्म से ही खोजी स्वभाव का होता है। वह जानना चाहता है कि उसके चारों ओर क्या है, दुनिया कैसी दिखती है, लोग कैसे रहते हैं, और प्रकृति कितनी विविधता से भरी हुई है। यही जिज्ञासा उसे यात्रा की ओर प्रेरित करती है।

🌍 यात्रा का असली अर्थ...

“यात्रा” का अर्थ केवल पर्यटन या सैर-सपाटा नहीं होता, बल्कि यह एक शैक्षिक और आत्मिक प्रक्रिया है। कहते हैं— “पुस्तकें हमें ज्ञान देती हैं, पर यात्रा हमें अनुभव देती है।”

जब हम किसी नए स्थान पर जाते हैं, तो हमें वहां की संस्कृति, भाषा, खानपान, वेशभूषा, और सामाजिक व्यवस्था के बारे में जानने का मौका मिलता है। यह ज्ञान किताबों में नहीं मिलता — यह केवल अनुभव से आता है।

🧘‍♂️ अकेले यात्रा करने के फायदे...

अकेले यात्रा करना एक प्रकार का स्वयं से संवाद है।
जब हम अकेले यात्रा करते हैं, तो हमें अपने अंदर झांकने का समय मिलता है। मोबाइल या सोशल मीडिया से दूर रहकर हम खुद से जुड़ते हैं। निर्णय क्षमता बढ़ती है: कहां जाना है, क्या करना है — इसका निर्णय आप स्वयं करते हैं। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है: अनजान जगहों पर अकेले सफर करना अपने आप में साहस का काम है। जीवन को देखने का दृष्टिकोण बदलता है: जब आप भिन्न परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो आप जीवन की छोटी-छोटी खुशियों की कद्र करना सीखते हैं। मन को शांति मिलती है: भीड़ से दूर प्रकृति के बीच एकांत में बिताया गया समय मानसिक स्वास्थ्य के लिए वरदान है।

👨‍👩‍👧‍👦 परिवार के साथ यात्रा के लाभ...

यदि यात्रा परिवार के साथ की जाए तो इसका आनंद कई गुना बढ़ जाता है। परिवार के सदस्य जब एक साथ यात्रा करते हैं तो उनके बीच संबंधों की गहराई बढ़ती है। बच्चे नई चीजें सीखते हैं — इतिहास, संस्कृति और भौगोलिक ज्ञान। पति-पत्नी और बुजुर्गों के साथ समय बिताने से भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है। यात्रा से परिवार में सकारात्मकता और एकता आती है।

🏕️ यात्रा की तैयारी और व्यवहारिक बातें...

सफल यात्रा के लिए योजना बनाना जरूरी है।

1. स्थान की जानकारी पहले से प्राप्त करें: जैसे वहां का मौसम, लोक संस्कृति, रहन-सहन, घूमने योग्य स्थल।

2. धन का प्रबंधन करें: यात्रा बजट के अनुसार खर्च करें, स्थानीय भोजन और ठहरने की सस्ती सुविधाओं का उपयोग करें।

3. सुरक्षा का ध्यान रखें: जरूरी दस्तावेज, पहचान पत्र और स्वास्थ्य संबंधी चीजें साथ रखें।

4. स्थानीय लोगों से संवाद करें: गूगल मैप्स या इंटरनेट पर निर्भर रहने के बजाय उनसे रास्ते पूछें — यही यात्रा का असली मज़ा है।

5. पैदल भ्रमण करें: जब आप पैदल चलते हैं तो आप उस जगह को महसूस करते हैं, न कि केवल देखते हैं।

🌄 यात्रा से होने वाले मानसिक और सामाजिक लाभ...

  1. मानसिक विकास: यात्रा मन को खोल देती है। यह संकुचित सोच को दूर कर व्यक्ति को व्यापक दृष्टिकोण देती है।
  2. सामाजिक योगदान: जब व्यक्ति विभिन्न समाजों को देखकर लौटता है, तो वह अपने समाज में सुधार की प्रेरणा लाता है।
  3. रचनात्मकता में वृद्धि: नई जगहों, दृश्यों और लोगों से मिलने पर मन में नए विचार जन्म लेते हैं।
  4. सहनशीलता और सहयोग की भावना: अलग-अलग संस्कृतियों के संपर्क में आने से दूसरों के प्रति सम्मान बढ़ता है।

🌏 प्रसिद्ध यात्री जिन्होंने दुनिया देखी...

  • इतिहास में कई ऐसे यात्री हुए जिन्होंने अपनी यात्राओं से दुनिया को नया दृष्टिकोण दिया —
  • ह्वेनसांग (Hiuen Tsang): चीन से भारत आकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया।
  • मार्को पोलो (Marco Polo): इटली से एशिया तक की यात्रा की और अपनी यात्रा के अनुभवों को विश्व प्रसिद्ध पुस्तक में लिखा।
  • इब्न बतूता (Ibn Battuta): मोरक्को के इस महान यात्री ने 30 से अधिक देशों की यात्रा की।
  • मेगस्थनीज (Megasthenes): सिकंदर के समय भारत आए और यहाँ की संस्कृति पर “इंडिका” नामक ग्रंथ लिखा।
  • राहल सांकृत्यायन (1893-1963): महान घुमक्कड़ और लेखक, जिन्होंने तिब्बत, सोवियत संघ, श्रीलंका, जापान, कोरिया, चीन, ईरान आदि देशों की यात्रा की और यात्रा वृत्तांत लिखे।
  • स्वामी विवेकानंद (1863-1902): आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने शिकागो में विश्व धर्म संसद (1893) में भाग लेने के लिए अमेरिका और यूरोप की यात्रा की और भारतीय दर्शन का प्रचार किया।
  • रवींद्रनाथ टैगोर (1861-1941): नोबेल पुरस्कार विजेता कवि और दार्शनिक, जिन्होंने साहित्य, कला और शिक्षा के प्रचार के लिए 30 से अधिक देशों की यात्रा की।


🧭 यात्रा: आत्मविकास की राह...

आज के समय में लोग इंटरनेट, यूट्यूब और सोशल मीडिया के माध्यम से जगहों के बारे में जान लेते हैं, परंतु वास्तविक अनुभव तब मिलता है जब आप उस जगह पर खुद कदम रखते हैं। पहाड़ की ठंडी हवा, मंदिर की घंटियों की गूंज, समुद्र की लहरों की आवाज़ — ये सब अनुभव केवल यात्रा से मिलते हैं। इसलिए यात्रा केवल शौक नहीं बल्कि एक जीवंत शिक्षा है। यह हमें सिखाती है कि दुनिया सुंदर है, जीवन छोटा है, और अनुभव ही असली संपत्ति हैं।

🌠 निष्कर्ष

यात्रा हमारे जीवन में नई ऊर्जा, नई सोच और नई प्रेरणा का संचार करती है।
चाहे धार्मिक यात्रा हो, ऐतिहासिक स्थल की खोज हो, या प्रकृति की गोद में कुछ पल बिताने की इच्छा हर यात्रा हमें थोड़ा और समृद्ध बनाती है। इसलिए, समय-समय पर यात्रा जरूर करनी चाहिए — अकेले भी, और परिवार के साथ भी।


   सवाल ❓ 

अगर आपको अवसर मिले कि आप दुनिया के किसी भी एक देश की यात्रा कर सकते हैं —
तो आप कौन-सा देश चुनेंगे और क्यों? 🌏✈️


मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

श्री राम की नगरी में दिवाली: अयोध्या धाम की भव्यता और भक्तिमय यात्रा...

     दिनांक 19 अक्टूबर 2025 की रात्रि में वाराणसी की आध्यात्मिक यात्रा के समापन के बाद, 20 अक्टूबर 2025 की सुबह हमने भगवान राम की पावन नगरी, अयोध्या धाम की ओर प्रस्थान किया। यह यात्रा केवल एक भौगोलिक बदलाव नहीं था, बल्कि एक ऐसा संक्रमण था जो हमें त्रेतायुग की पौराणिक भूमि और आधुनिक भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक पुनरुत्थान के केंद्र तक ले जा रहा था।

वाराणसी लखनऊ इंटरसिटी एक्सप्रेस से लगभग सुबह 10:00 बजे हम अयोध्या पहुँचे। अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन की सुंदरता, स्वच्छता और आधुनिकता ने मन को पहली नज़र में ही मोह लिया। स्टेशन का भव्य और सुसज्जित रूप इस बात का प्रमाण था कि अयोध्या एक नए युग की दहलीज पर खड़ी है। स्टेशन के निकट ही एक सुविधाजनक धर्मशाला में हमने अपना ठिकाना बनाया।
सुबह की ताजगी और अयोध्या की हवा में घुली भक्ति की सुगंध ने हमें तुरंत तैयार होने के लिए प्रेरित किया। नाश्ते में धर्मशाला के पास ही इडली-डोसा का आनंद लिया, जो उत्तर और दक्षिण भारत के स्वाद का एक सुखद संगम था। फिर, पूरे परिवार ने रामलला के मंदिर की ओर 1 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू की।

रामलला मंदिर परिसर की भव्यता अविश्वसनीय थी। सैकड़ों एकड़ में फैला यह क्षेत्र अभी भी निर्माण के अधीन है, और इसे पूरी तरह से तैयार होने में शायद एक या दो साल और लगेंगे। लेकिन इस निर्माणाधीन अवस्था में भी इसकी विशालता, इसका वास्तुशिल्प और इसकी योजनाबद्धता मन को अचंभित कर रही थी। मंदिर परिसर की दिव्यता, और रामलला का भव्य राम मंदिर, जो प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत संगम है, सचमुच दर्शनीय था।
पत्थरों की नक्काशी, कला और वास्तुकला की बारीकियां, और निर्माण में उपयोग की गई उन्नत तकनीकें यह दर्शाती हैं कि यह मंदिर आने वाले समय में विश्व के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक होगा। श्री राम प्रभु की सुंदर, आकर्षक और मनमोहक मूर्ति देखकर हृदय में एक अविस्मरणीय शांति और आनंद का संचार हुआ। इस स्थल पर आने के बाद मेरा मन पुलकित हो उठा।
सबसे बड़ी खुशी इस बात की थी कि जिस स्थल से दीपावली का वास्तविक आरंभ हुआ, जहाँ से श्री राम की गूंज और विजय की शुरुआत हुई, उसी स्थल पर दीपोत्सव के अवसर पर आने का यह मौका मिला। यह मेरे लिए एक रोचक और प्रेरणादायक अनुभव था, जिसने दिवाली के महत्व को एक नई परिभाषा दी।
दर्शन के उपरांत, हम धर्मशाला लौटे और बगल में स्थित बिरला धर्मशाला में मात्र \text{40} रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से स्वादिष्ट और सात्विक भोजन का आनंद लिया।

दोपहर के भोजन और कुछ देर विश्राम के पश्चात, लगभग \text{4:00} बजे हम सब परिवार राम की पैड़ी की ओर चल पड़े। यह सरयू नदी के तट पर स्थित वह पवित्र स्थल है, जहाँ प्रतिवर्ष दीपोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है। सरयू नदी का शांत प्रवाह, उसकी भव्यता और तट का सौंदर्य मन को मोह रहा था। हमने उस पवित्र नदी के दर्शन किए, जिसके किनारे बैठकर श्री राम ने अयोध्या का शासन किया।
यहाँ हमने गोलगप्पे खाए, जो न केवल स्वादिष्ट थे, बल्कि स्वच्छता के मानकों पर भी खरे उतरे। यह इस बात का संकेत था कि अयोध्या अब पर्यटकों की सुविधा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहा है।

शाम 6:00 बजे सरयू आरती शुरू हुई। आरती की गूंज, घंटियों की ध्वनि और दीपों की जगमगाहट ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। दिवाली के अवसर पर तो पूरा शहर ही जगमग रोशनी में नहाया हुआ था। हर तरफ रोशनियां बिखर रही थीं, जो एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरी अयोध्या नगरी श्री राम के आगमन के लिए दीपों की माला से सजी हो।
आरती के बाद उत्तर प्रदेश पर्यटन द्वारा आयोजित एक भव्य कार्यक्रम का अनुभव हुआ, जिसने पूरी यात्रा का सार बन गया।

लेजर लाइट शो और {ड्रोन} नवाचार: उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के इस नवाचार ने सचमुच मेरा मन मंत्रमुग्ध कर दिया। लेजर लाइटर शो और हजारों {ड्रोन} के माध्यम से आकाश में प्रभु राम से संबंधित चित्रों का वर्णन किया जा रहा था। यह एक आधुनिक तकनीक और प्राचीन गाथा का अद्भुत मिश्रण था। आकाश में तैरती श्री राम, हनुमान, रामसेतु और अयोध्या के दृश्य मानो साक्षात उपस्थित थे। यह कार्यक्रम न केवल आकर्षक और नया था, बल्कि इसने दर्शकों को अयोध्या के बारे में और श्री राम प्रभु के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारी भी दी। तकरीबन आधे घंटे तक चला यह शो मेरे और मेरे परिवार के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव था। इसे देखकर मेरे परिवार का दिल गदगद हो गया, खासकर बच्चों (दिव्यांशु और प्रियांशु) ने इस तकनीकी चमत्कार का भरपूर आनंद लिया।
रात्रि का भ्रमण और लता मंगेशकर चौक: कार्यक्रम के समापन के पश्चात, हम पैदल ही अयोध्या की सजी-धजी सड़कों पर घूमने निकले। शहर को इस तरह से सजाया गया था, मानो हम सीधे त्रेतायुग की अयोध्या में आ गए हों, जब श्री राम वनवास से लौटकर आए थे और पहली दीपावली मनाई गई थी।
हम लता मंगेशकर चौक पहुँचे, जो अपनी सुंदरता और वीणा की कलाकृति के लिए जाना जाता है। चौक के पास एक होटल में हमने रात्रि का भोजन किया और पैदल ही अपने धर्मशाला तक पहुँचे। रात्रि {10:00} बजे हमने विश्राम किया।

अगले दिन सुबह {6:00} बजे हम उठकर तैयार हुए और अयोध्या के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को देखने निकले। हमने राजा दशरथ महल, कनक भवन और हनुमानगढ़ी के दर्शन किए।
 * हनुमानगढ़ी: 76 सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर स्थित यह मंदिर, जहाँ संकटमोचन हनुमान जी महाराज विराजमान हैं, एक शक्तिशाली आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है।
 * कनक भवन: भगवान राम और माता सीता को कैकेयी द्वारा दिया गया यह महल अपनी सोने-जड़ित मूर्तियों और भव्यता के लिए जाना जाता है।
 * राजा दशरथ महल: यह महल अयोध्या के राजा दशरथ की पुरानी विरासत को दर्शाता है।
इन स्थानों पर जाकर हमने अयोध्या के पुराने मकानों को देखा और समझा कि प्राचीन काल में अयोध्या कैसी लगती होगी। यह यात्रा न केवल रमणीय थी, बल्कि ज्ञानवर्धक और एडवेंचर से भरी हुई भी थी।

चुनौतियाँ और सुधार की आवश्यकता:

इस पूरी यात्रा के दौरान मैंने कुछ ऐसी समस्याओं को भी महसूस किया, जिन पर स्थानीय प्रशासन और सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

 * भिखारियों की बढ़ती संख्या: हर मंदिर के पास दर्जनों भिखारियों का समूह एक गंभीर चुनौती है। यह शहर की सकारात्मक छवि को धूमिल करता है।
 * ऑटो चालकों का दुर्व्यवहार: ऑटो चालकों द्वारा यात्रियों से गलत तरीके से और अत्यधिक पैसे वसूलना एक आम शिकायत है।
 * स्वच्छता की समस्या: हनुमानगढ़ी, कनक भवन और राजा दशरथ महल के आसपास साफ-सफाई की व्यवस्था संतोषजनक नहीं थी, जो मन को दुखी करती है।
 * जबरन टीका-चंदन: कई स्थानों पर पुरुष और महिलाएँ जबरदस्ती श्री राम जी का टीका-चंदन लगाकर दक्षिणा के नाम पर पैसे ऐंठते हैं, यह स्थिति असहज पैदा करती है और इसे सुधारे जाने की आवश्यकता है।

अयोध्या में लाखों लोग प्रतिमाह दर्शन और भ्रमण के लिए आते हैं। यदि वे ऐसी नकारात्मक छवि लेकर जाएंगे, तो हमारे इस 'अयोध्या धाम' की बदनामी होगी। मेरा विनम्र निवेदन है कि स्थानीय प्रशासन, सरकार और मंदिर ट्रस्ट को इन समस्याओं पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि अयोध्या धाम की दिव्यता और पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे।

घर वापसी और मधुर स्मृतियाँ:
दर्शन और भ्रमण के उपरांत, दोपहर {2:00} बजे हम अयोध्या धाम स्टेशन पहुँचे। स्टेशन की सुंदरता और साफ-सफाई देखकर मन फिर से गदगद हो गया। यहाँ से हमने गंगा सतलज एक्सप्रेस ली, जो हमें अनुग्रह नारायण रोड, औरंगाबाद, बिहार तक ले आई। रात्रि {12:00} बजे हम घर पहुँचे।
यह यात्रा परिवार के लिए अत्यंत आनंददायक, मन को सुकून और शांति देने वाली रही। दिव्यांशु और प्रियांशु ने इस भ्रमण का खूब मजा लिया। हमने अयोध्या से पूजा प्रसाद, मूर्ति और विभिन्न प्रकार की सामग्री की खरीदारी भी की। यह दिवाली की यात्रा मेरे जीवन की सबसे यादगार और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध यात्राओं में से एक बन गई।

 सवाल:
अयोध्या में रामलला का जो भव्य मंदिर बन रहा है, उसमें आधुनिक तकनीक और प्राचीन वास्तुकला का संगम दिखाया गया है। आपके अनुसार, इस मंदिर के निर्माण में 'प्राचीनता और आधुनिकता के संगम' को दर्शाने वाली सबसे अनूठी विशेषता क्या है?




रविवार, 19 अक्टूबर 2025

विंध्याचल से विश्वनाथ की नगरी तक का सफर एवं काशी का घाटों की गाथा और गलियों का एडवेंचर...


 शक्ति की देवी माँ विंध्यवासिनी के भव्य दर्शन और सुबह की निर्मल आरती में शामिल होने के बाद, हम अपने अगले पड़ाव – भगवान शिव की नगरी, काशी – की ओर अग्रसर थे। यह यात्रा सिर्फ किलोमीटरों की नहीं, बल्कि आध्यात्म के एक नए आयाम की ओर बढ़ना था।
सुबह के 10:00 बजे थे जब हमने विंध्याचल से बनारस के लिए बस पकड़ी। विंध्याचल से बनारस की दूरी महज़ 60 किलोमीटर है और प्रति व्यक्ति किराया ₹100। उत्तर प्रदेश की सड़कों पर सरपट भागती बस ने हमें दो घंटे के भीतर ही शिव की नगरी के द्वार पर ला खड़ा किया।
ठीक दोपहर 12:00 बजे, 19 अक्टूबर 2025 (दीपावली का दिन), हम बनारस की ऊर्जा में गोता लगा चुके थे। स्टेशन से निकलकर हमने सबसे पहले एक धर्मशाला का रुख किया। शहर की भाग-दौड़ और दीपावली की भीड़ के बीच, धर्मशाला में स्नान और थोड़ा विश्राम किसी अमृत से कम नहीं था। बच्चों डुग्गू और पुच्छु (दिव्यांशु और प्रियांशु) को भी इस दो घंटे के आराम की सख्त ज़रूरत थी।

दोपहर 2:00 बजे, हमने विश्वनाथ मंदिर और घाटों की ओर पैदल ही प्रस्थान किया। धर्मशाला से मंदिर तक की लगभग 2 किलोमीटर की यह यात्रा हमारे बनारस एडवेंचर का पहला अध्याय थी। दीपावली के कारण शहर में असाधारण भीड़ थी। सड़कों पर पैदल चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं था – हर तरफ़ इंसान, रिक्शा, और मोटरसाइकिलें, जो यह दर्शाती थीं कि हम दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहर के हृदय में हैं। मंदिर के समीप ही गंगा के दर्जनों घाटों की श्रृंखला शुरू होती है। ये घाट बनारस की पहचान हैं, उसकी आत्मा हैं। हम पैदल चलते हुए एक घाट पर जा बैठे।

बनारस में 80 से अधिक घाट हैं, और हर घाट की अपनी एक कहानी है, अपना एक इतिहास है। हम सभी के मन में एक ही सवाल था: ये अनगिनत घाट कब और कैसे बने?

दरअसल, बनारस के अधिकांश घाटों का निर्माण 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य और स्थानीय राजाओं द्वारा किया गया था। मराठा शासकों, विशेष रूप से इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर और पेशवाओं ने, इन घाटों के पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये घाट केवल स्नान या पूजा के लिए नहीं, बल्कि जीवन के उत्सव और अंतिम संस्कार दोनों के लिए हैं, जो इस शहर को "मोक्ष की नगरी" का दर्जा देते हैं।

हम मान सिंह घाट पर लगभग 20 मिनट तक रुके। गंगा की शांत धारा, सामने तैरती नावें, और दूर होती शाम की रोशनी... यह दृश्य अविस्मरणीय था। घाट सालों भर खूबसूरत रहते हैं। यहाँ बैठ कर गंगा को देखना, लोगों को वोटिंग (नौका विहार) का आनंद लेते हुए देखना और शाम में होने वाली भव्य गंगा आरती (जिसे देखने के लिए हम देर शाम लौटेंगे) की प्रतीक्षा करना, बनारस के अनुभव का सार है।
दिव्यांशु, प्रियांशु और हम पति-पत्नी ने मिलकर गंगा किनारे खूब मस्ती की, पत्थरों पर बैठे, और शहर के इस जीवंत दृश्य का आनंद लिया।
काशी विश्वनाथ: भीड़ में छिपा दैवीय अनुभव
घाटों का भ्रमण करने के बाद, हम विश्वनाथ मंदिर की ओर चल पड़े। यह मंदिर घाटों के बेहद नज़दीक है, लेकिन मंदिर तक पहुँचने का रास्ता उन संकरी, भूल-भुलैया जैसी गलियों से होकर जाता है जो बनारस को उसका असली एडवेंचर वाला स्वरूप देती हैं।
पैदल गलियों से चलते हुए हम विश्वनाथ धाम पहुँचे। दीपावली होने के कारण मंदिर में दर्शनार्थियों की लंबी कतार लगी थी। यह कतार सिर्फ़ उत्तर भारतीयों की नहीं थी; हमने देखा कि दर्शनार्थियों में दक्षिण भारत से आए लोगों की संख्या बहुत अधिक थी। उनकी श्रद्धा और शांतिपूर्ण इंतज़ार ने हमें भी प्रभावित किया।
कतार में लगभग दो घंटे बिताने के बाद, हमें शिव के ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य मिला। मंदिर के अंदर की ऊर्जा इतनी सकारात्मक और तीव्र थी कि भीड़ की सारी परेशानी पल भर में दूर हो गई। हमने यहाँ के भाव आरती का मज़ा लिया और तकरीबन दो घंटे का समय पवित्र परिसर में बिताया।

आधुनिकता का स्पर्श: मंदिर परिसर में VR - एक रोचक बात जो हमने मंदिर के कैंपस में देखी, वह थी VR (वर्चुअल रियलिटी) की सुविधा। यह टेक्नोलॉजी उन लोगों को मंदिर का एक विस्तृत और 360-डिग्री दर्शन कराती है जो शायद भीड़ के कारण या शारीरिक अक्षमता के चलते गर्भगृह तक नहीं पहुँच पाते हैं। यह 21वीं सदी के बनारस की पहचान है – जहाँ प्राचीनतम आस्था, आधुनिकतम तकनीक को गले लगाती है। यह अनुभव ऐसा लगता है मानो सारी चीज़ें हमारे पास ही हों।

दर्शन और आरती-मंगल के पश्चात, हम बनारस की उन विश्व-प्रसिद्ध गलियों में निकल पड़े जहाँ कदम-कदम पर कोई न कोई आश्चर्य आपका इंतज़ार करता है।
यह गलियाँ किसी एडवेंचर से कम नहीं हैं। ये इतनी संकरी हैं कि एक व्यक्ति मुश्किल से निकल पाए, और इनमें अचानक एक तरफ़ प्राचीन मंदिर नज़र आता है, तो दूसरी तरफ़ गरमागरम पकवानों की दुकान। गायों का आना-जाना, मंदिरों में गूँजती घंटियाँ, और पकवानों की खुशबू – ये सब मिलकर एक अद्भुत, अविस्मरणीय संवेदी अनुभव देते हैं।
इन गलियों में छोटे-बड़े, सस्ते-महंगे, हर प्रकार के होटल और ठहरने तथा खाने-पीने की व्यवस्थाएँ हैं। गोलगप्पे, गरमागरम जलेबी-दूध, और बनारस के प्रसिद्ध पान की दुकानें हर नुक्कड़ पर मिल जाती हैं।
भूख लग चुकी थी। मंदिर के समीप ही एक रेस्टोरेंट में हम रुके, जहाँ हमने गर्मागर्म डोसा खाया और चाय की चुस्कियों का आनंद लिया। बच्चों ने तो डोसे और चाय का खूब मज़ा लिया।
शाम को हम गडोलीया चौक पहुँचे, जो बनारस की भाग-दौड़ का केंद्र बिंदु है। यहाँ की रौनक और भीड़ देखने लायक थी। हमने प्रेम से गोलगप्पे खाए (जिसके बिना बनारस की यात्रा अधूरी है) और फिर देर रात अपना रात्रि भोजन किया।
रात्रि में इन गलियों और चौकों में घूमने का अपना ही मज़ा है – यह शहर रात को भी जागता रहता है, जीवन के अलग-अलग रंग दिखाता रहता है। रात के 9:00 बजे, हम थके-हारे पर संतुष्ट मन से अपने धर्मशाला पहुँचे और रात्रि विश्राम किया।

यह हमारा बनारस में सिर्फ़ एक दिन था, पर यह एक दिन बनारस के जीवन, धर्म और एडवेंचर को समझने के लिए काफ़ी था।
अगले दिन सुबह 21 अक्टूबर (सोमवार) को 6:00 बजे, हमने बनारस-अयोध्या इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी और अपनी यात्रा के तीसरे और अंतिम पड़ाव – प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या – के लिए रवाना हो गए।
काशी का यह अनुभव हमारे दिल में हमेशा के लिए अंकित हो गया। यहाँ की गलियाँ, घाट, और विश्वनाथ की भव्यता – सब कुछ जीवन के शाश्वत सत्य को दर्शाते हैं।

 सवाल:
बनारस (काशी) के घाटों की श्रृंखला, जो इस शहर की मुख्य पहचान है, का निर्माण मुख्य रूप से किस 18वीं शताब्दी के साम्राज्य और उसकी एक प्रसिद्ध महारानी द्वारा करवाया गया था?



शक्ति, श्रद्धा का सफर: एक अविस्मरणीय विंध्याचल यात्रा...

हर साल की तरह, इस बार भी मन में एक ही संकल्प था – इस दशहरे पर परिवार संग एक लम्बी धार्मिक यात्रा पर निकलना है। माँ विंध्यवासिनी, काशी विश्वनाथ और राम लला की नगरी अयोध्या का बुलावा काफी समय से था। योजनाएँ बनीं, मन में उत्साह की लहरें उठीं, लेकिन दफ्तर के काम की बेड़ियों ने छुट्टी मिलने नहीं दी। दशहरा बीत गया, और मन मसोस कर रह गया। पर कहते हैं ना, जब भगवान बुलाते हैं तो रास्ता अपने आप बन जाता है। दिवाली का समय नज़दीक था, और इस बार मैंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, यह यात्रा पूरी करनी है।

और फिर, वह शुभ दिन आया – 18 अक्टूबर, 2025, दिन शनिवार। बिहार के औरंगाबाद से हम चार यात्री – मैं, मेरी जीवनसंगिनी, और हमारे प्यारे बच्चे डुग्गू और पुच्चु – अपने पहले पड़ाव, विंध्याचल के लिए तैयार थे। दोपहर 3:00 बजे 'महाबोधि एक्सप्रेस' की लम्बी सीटी ने हमारे रोमांचक सफर का आगाज़ किया। ट्रेन की खट-खट और बच्चों की किलकारियों के बीच, हमने लगभग 3 घंटे का सफर तय किया। यह सफर सिर्फ दूरी का नहीं था, बल्कि रोज़मर्रा की भाग-दौड़ से आध्यात्मिक शांति की ओर एक पलायन था।

शाम के ठीक 6:00 बजे, ट्रेन ने हमें विंध्याचल के स्टेशन पर उतार दिया। स्टेशन से मंदिर धाम की दूरी लगभग 2 किलोमीटर थी। हवा में एक अलग सी सुगंध थी – गंगा की शीतलता और धूप-दीप की महक का मिश्रण, जो तुरंत मन को शांत कर देता है। एक छोटे से रिक्शे में सामान लादे, हम पहुंचे विंध्याचल धाम। यहाँ सैकड़ों की संख्या में धर्मशालाएं और होटल हैं, जो 500 रुपए से लेकर 5000 रुपए तक के किराये पर आसानी से मिल जाते हैं। हमने भी मंदिर के पास ही एक धर्मशाला, जिसका नाम यात्री निवास था, 500 रुपए के किराए में कमरा ले लिया। यह स्थान बेहद आरामदायक और सुविधापूर्ण था।
कमरे में आते ही, बच्चों ने सामान फैलाया और हमने तुरंत खुद को तरोताज़ा किया। दिन भर की यात्रा की थकान गायब हो गई और माँ के दर्शन का उत्साह चरम पर था।

शाम के 7:00 बजे, हम मंदिर की ओर निकले। विंध्याचल को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है, ऐसा स्थान जहाँ देवी सती के शरीर का अंग गिरा था। यह एक पवित्र त्रिकोण (Triangle) का केंद्र भी है, जिसमें माँ विंध्यवासिनी (केंद्र), माँ काली (पूर्व) और माँ अष्टभुजा (पश्चिम) के दर्शन किए जाते हैं।
जैसे-जैसे हम मंदिर के मुख्य द्वार की ओर बढ़े, भक्तों का एक विशाल, ऊर्जावान जनसैलाब हमें अपनी ओर खींचता गया। 7:00 बजे के बाद यहाँ की भीड़ अपने चरम पर होती है। यह भीड़ कोई सामान्य भीड़ नहीं थी, यह हर कोने से आए कृष्ण प्रेमियों की भीड़ थी जो अपनी मनोकामनाओं को लेकर आए थे। भीड़ के बीच से गुजरना अपने आप में एक मिनी-एडवेंचर था। बच्चों को गोद में थामे, पत्नी का हाथ पकड़े, हम धीरे-धीरे गर्भगृह की ओर बढ़े। सुरक्षा घेरे के बावजूद, हर भक्त माँ का एक झलक पाने को बेचैन था।

जब सामने माँ विंध्यवासिनी की भव्य, शांत मूर्ति दिखी, तो मन एकदम स्तब्ध हो गया। वह पल ऐसा था, मानो सारी इच्छाएँ और चिंताएँ एक पल में विलीन हो गईं। माँ की आँखों में असीम करुणा थी। हमने हाथ जोड़कर उनका आशीर्वाद लिया।
एवं हमने मंदिर परिसर में थोड़ी देर सैर की। विंध्याचल में दशहरे के समय तो मानो तिल रखने की भी जगह नहीं होती है। यह वह समय होता है जब माँ का विशेष श्रृंगार किया जाता है, और दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी-अपनी विशेष पूजा-पाठ करने आते हैं, जिनकी मनोकामनाएँ पूरी हुई होती हैं। हमने देखा कि पूरे साल यहाँ तीर्थयात्री आते रहते हैं, लेकिन दशहरे की ऊर्जा और भीड़ का मुकाबला नहीं।

दर्शन और पूजा-आरती के बाद पेट पूजा का समय था। मंदिर के पास ही पांडे जी का होटल था, जहाँ हमने रात्रि का भोजन किया। सच कहूँ तो, खाने का स्वाद अद्भुत था – सादा, ताज़ा, और बहुत ही स्वादिष्ट! पर खाने से भी ज़्यादा अच्छा था पांडे जी का व्यवहार। उनकी विनम्रता और अपनत्व से हमारा मन गदगद हो गया।
पेट भर कर और मन को तृप्त करके, रात के 9:00 बजे हम अपने धर्मशाला वापस लौटे और सुकून की नींद ली।

अगले दिन की शुरुआत 5:30 बजे हुई। एक नई ताजगी और उत्साह के साथ हम तैयार हुए।
विंध्याचल मंदिर के समीप ही पतित-पावनी गंगा नदी बहती है। डुग्गू और पुच्छु का हाथ थामे हम गंगा घाट की ओर बढ़े। सुबह का वातावरण शांत और निर्मल था। गंगा का स्पर्श लेते ही, एक अद्भुत ऊर्जा का संचार हुआ। गंगा स्नान के बाद, हम वापस मंदिर पहुँचे और 6:00 बजे की सुबह की आरती में भाग लिया। सुबह की आरती का दृश्य सचमुच अलौकिक था। ढोल, नगाड़े, घंटे और शंख की ध्वनि से पूरा वातावरण गूँज रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम किसी और ही दुनिया में आ गए हैं। इस समय की पूजा-पाठ और दृश्य शांतिदायक और मनोरम था। बच्चों ने भी पूरी श्रद्धा से हाथ जोड़े।
बच्चों ने पास की दुकान से खिलौने लिए।  हर यात्रा का एक छोटा लेकिन ज़रूरी हिस्सा होता है।

इसके बाद सुबह का नाश्ता भी हमने मंदिर के नज़दीक ही किया, और अब समय था अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ने का।
तकरीबन 10:00 बजे, हमने बनारस (वाराणसी) के लिए बस पकड़ी। माँ विंध्यवासिनी का आशीर्वाद हमारे साथ था, और मन में काशी विश्वनाथ के दर्शन की उत्सुकता लिए हम बनारस की ओर रवाना हो गए।
यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थी, बल्कि यह हमारे परिवार के लिए एक ऐसा एडवेंचर था जहाँ हमें भारतीय संस्कृति की शक्ति, धार्मिक एकता और प्रेम का अनुभव हुआ। विंध्याचल का यह सफर हमेशा हमारी यादों में एक उज्जवल स्थान रखेगा।

 प्रश्न:
विंध्याचल धाम को किन तीन प्रमुख देवियों के मंदिरों के पवित्र त्रिकोण का केंद्र माना जाता है, और यह किस प्रमुख धार्मिक घटना से संबंधित 51 शक्तिपीठों में से एक है?


जीविका: गांव-गांव में जगाती उम्मीद की अलख – 18 वर्षों की एक कर्मयोग यात्रा....


संघर्ष से स्वावलंबन तक: 'जीविका'—एक कर्मयोगी की 18 साल की अविस्मरणीय यात्रा

पहला अध्याय: जब मंज़िल ने पुकारा—उम्मीद की वह किरण..



10 अक्टूबर 2007, मेरे कैलेंडर का वह निशान है, जो एक हताश युवा के जीवन में आशा की इबारत लिख गया। बाहर रेलवे, बैंक, सेना में मेरे दोस्त कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, और मैं—विभिन्न परीक्षाओं के चक्रव्यूह में उलझा—अपने भविष्य को लेकर गहरे असमंजस में था। वह दौर था जब हर विज्ञापन एक छलावा लगता था, हर परीक्षा एक चुनौती जिसे पार करना मुश्किल था।

ठीक तभी, एक विज्ञापन दिखा—जीविका (BRLPS) का। मन में सहसा उम्मीद की एक किरण कौंधी। आवेदन किया, और नियति का चमत्कार देखिए, मेरा चयन भी हो गया। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी; यह मेरे जीवन का पहला बड़ा मोड़ था। तब मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा मिशन बनने जा रहा है, एक ऐसा महाकाव्य जिसकी पटकथा बिहार के गाँव-गाँव में लिखी जानी थी।

दूसरा अध्याय: अनजान धरती पर दीक्षा—आंध्र प्रदेश का 'गुरु-कुल'

चयन के बाद का अगला कदम किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं था। 45 दिनों के कठोर प्रशिक्षण के लिए मुझे सुदूर आंध्र प्रदेश के कुरनूल, वारंगल और खम्मम जैसे ज़िलों में भेजा गया। वह मेरे लिए 'गुरु-कुल' जैसा था।

वहां मैंने जो देखा, वह किसी जादू से कम नहीं था।

गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण सिर्फ कागजी नारे नहीं थे; वे Community Based Organisations (CBO) के जीवित, धड़कते मॉडल थे। गांवों की महिलाएं, जो शायद ही कभी घर की दहलीज लांघती थीं, वे अब स्वयं सहायता समूह (SHG) चला रही थीं। वे आत्मविश्वास से निर्णय ले रही थीं, अपने समुदाय की दिशा तय कर रही थीं।

उनके हाथों में बही-खाते थे, उनकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक थी।

यह अनुभव मेरे लिए 'आँख खोल देने वाला' था। मेरे मन में एक तूफ़ान उठा—अगर आंध्र की गरीब महिलाएं यह कर सकती हैं, तो मेरे बिहार की महिलाएं क्यों नहीं? हमें बस चाहिए थी सही दिशा, सामूहिक प्रयास, और अटूट विश्वास। वह क्षण मेरे अंतर्मन में जीविका के आंदोलन की नींव डाल गया।

तीसरा अध्याय: सामुदायिक भवन में पहला मोर्चा—संघर्ष और पिता की प्रेरणा

प्रशिक्षण से लौटकर, मेरी असली अग्निपरीक्षा शुरू हुई। मुझे तीन महीने तक गांव के सामुदायिक भवन में रहकर काम करना पड़ा। वह कोई वातानुकूलित दफ्तर नहीं था। सीमित संसाधन, गांव की कच्ची परिस्थितियां, और सबसे बढ़कर—लोगों का प्रारंभिक संकोच। लोग बाहरी को शक की निगाह से देखते थे।

कई बार मन में भटकाव आता, निराशा घेरती कि क्या मैं इस पथ पर टिक पाऊँगा?

ठीक इसी दौरान, मेरे पिताजी की आवाज ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनके शब्द आज भी मेरे दिल में गूँजते हैं:

"कोई भी कार्य मिले, तन-मन से करो। साथ ही, आगे बढ़ने के अवसरों के लिए भी प्रयास करते रहो।"

इन शब्दों ने मेरे संदेह को साहस में बदल दिया। पिताजी ने मुझे सिखाया कि यह नौकरी सिर्फ एक वेतन नहीं है, यह एक धर्म है, एक कर्मयोग है। उनकी प्रेरणा से, 12 मई 2008 को मैंने जीविका में औपचारिक रूप से योगदान दिया—यह मेरे लिए नौकरी का पहला दिन नहीं, बल्कि एक आंदोलन का हिस्सा बनने का क्षण था।

चौथा अध्याय: बिहार के रणक्षेत्र में साहसिक पड़ाव

अगले 18 वर्षों तक, मेरी यात्रा बिहार के विभिन्न ज़िलों में एक अविस्मरणीय रोडमैप पर चली—गया (बोधगया, आमस), जहानाबाद (हुलासगंज), मुजफ्फरपुर और वर्तमान में औरंगाबाद। हर जिला एक नया एडवेंचर था, हर गाँव एक नई सीख

मेरा काम एक मिशन बन चुका था, जिसके केंद्र बिंदु थे:

  • SHG का गठन और सुदृढीकरण: लाखों गरीब महिलाओं को एक अटूट धागे में पिरोकर एक मजबूत सामुदायिक ढांचा बनाना।

  • महिलाओं का दोहरी सशक्तिकरण: उन्हें केवल वित्तीय रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी इतना मजबूत बनाना कि वे हर मंच पर अपनी बात रख सकें।

  • सामुदायिक नेतृत्व का विकास: "दीदियों" को इस काबिल बनाना कि वे अपने गाँव की नेता खुद बनें।

मैंने गांवों में देखा कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी लोग बदलाव के लिए तैयार रहते हैं, उन्हें बस एक सही मार्गदर्शन और भरोसा चाहिए।

पांचवां अध्याय: ट्रेनिंग ऑफिसर की बागडोर—ज्ञान का प्रकाश

2014 में, मेरी यात्रा में एक और रोमांचक मोड़ आया। मुझे मुजफ्फरपुर में प्रशिक्षण अधिकारी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। यह मेरे करियर का एक क्वांटम लीप था।

अब मेरा काम सिर्फ स्वयं कार्य करना नहीं था, बल्कि हजारों 'दीदियों' और फील्ड कर्मियों को प्रशिक्षित करना था। मेरी भूमिका अब सिर्फ काम करने वाले की नहीं, बल्कि हजारों बदलाव करने वालों के गुरु की थी।

प्रशिक्षण मेरे लिए केवल जानकारी देने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह सोच और दृष्टिकोण को बदलने का माध्यम बन गया। मैं आज भी औरंगाबाद में यही प्रयास करता हूँ कि हर प्रशिक्षण एक औपचारिकता न हो, बल्कि हर प्रतिभागी के जीवन में एक वास्तविक परिवर्तन का कारण बने।

छठा अध्याय: एक जनांदोलन की झांकी

जीविका सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं है—यह एक जनांदोलन है, एक सामूहिक चेतना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबी को मिटाकर, महिलाओं को वित्तीय, सामाजिक और मानसिक रूप से सशक्त कर, उन्हें अपने जीवन के निर्णय खुद लेने में सक्षम बनाना है।

पिछले 17 वर्षों में हमने क्या-क्या किया, यह किसी महाकाव्य के अध्याय से कम नहीं है:

  1. वित्तीय समावेशन: लाखों दीदियों को बैंक लिंकेज, आंतरिक ऋण और वित्तीय साक्षरता से जोड़कर आर्थिक स्वतंत्रता दी।

  2. सामुदायिक संस्थाओं का निर्माण: ग्राम संगठन, क्लस्टर लेवल फेडरेशन (CLF) बनाकर, दीदियों को अपनी संस्थाओं का मालिक बनाया।

  3. आजिविका का संवर्धन: खेती, पशुपालन, लघु व्यवसाय और किचन गार्डनिंग को बढ़ावा देकर, उन्हें उद्यमी बनाया।

  4. सामाजिक विकास: स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता पर जागरूकता फैलाकर जीवन की गुणवत्ता सुधारी।

और हाँ, 2018 में शुरू हुई सतत जीविकोपार्जन योजना (SJY) ने तो अत्यधिक गरीब परिवारों के जीवन में सचमुच नई रोशनी डाली। यह केवल आय बढ़ाने की योजना नहीं थी, यह उन्हें गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने की दिशा थी।

सातवाँ अध्याय: मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि—कर्मयोग का सार

इन 17 वर्षों की साहसिक यात्रा ने मुझे जीवन के कुछ सबसे बड़े सूत्र सिखाए:

  • विश्वास सबसे बड़ा बदलाव लाता है: जब किसी को उसकी क्षमता पर भरोसा होता है, तो वह असंभव को भी संभव कर देता है।

  • समुदाय की शक्ति अपार है: SHG की महिलाएं मिलकर समाज की सोच को बदल सकती हैं।

  • प्रशिक्षण जीवन बदल सकता है: सही समय पर दी गई सही सीख, पूरी जिंदगी का रास्ता बदल देती है।

जीविका में बिताए गए ये साल मेरे लिए सिर्फ 'नौकरी' नहीं थे—यह मेरा कर्मयोग था। मेरा नाम किसी बड़ी किताब में छपे, न छपे, कोई बात नहीं।

लेकिन, हर बार जब मैं किसी ग्रामीण महिला को आत्मविश्वास से बोलते देखता हूँ, किसी किसान को अपने उत्पाद बाजार में बेचते देखता हूँ, या किसी नवयुवक को स्वरोजगार करते देखता हूँ—तो मेरे अंतर्मन से आवाज़ आती है:

"हाँ, मेरा जीवन सार्थक है।"

जीविका मेरे लिए केवल संस्था नहीं है, बल्कि यह गाँव-गाँव में जाग रही उम्मीद की चेतना है। 12 मई 2008 से आज तक की मेरी यात्रा एक विचार से शुरू हुई थी, जो अब मेरा जीवन बन चुकी है।


लेख से संबंधित रोचक सवाल (Adventurous Question)

जीविका के इस 18 वर्षीय सफर में, आपको सबसे बड़ा प्रशासनिक एडवेंचर किस चुनौती को सुलझाने में महसूस हुआ, जब ग्रामीण महिलाओं के समूह (SHG) ने किसी स्थानीय सामाजिक बुराई (जैसे: शराबबंदी या दहेज) के खिलाफ गाँव में एक अभूतपूर्व सामूहिक निर्णय लिया? उस घटना का संक्षिप्त सार क्या था?